OM JAI JAGDISH HARE: Aarti ; ॐ जय जगदीश हरे ;


OM JAI JAGDISH HARE: Aarti
” OM JAI JADISH HARE ” is the most sung devotional song ( aarti ) sung all over the world , each day in Hindu households , places of worships and temples. The Aarti is sung at the end of most of the prayers, worships and rituals. The song was composed by Pandit Sharadha Philauri in or around 1870s. Pandit Sharadha Nand ji was born in Phillaur near Ludhiana in Punjab.

om jaiom jaiom jaiom jai

ॐ जय जगदीश हरे ;
सब से अधिक गाये जानेवाला भजन /आरती है जो सभी हिन्दु परिवारों तथा मंदिरों में प्रति दिन सारे संसार मे गाई जाती है ; इसके रचयिता हैं पंडित शरधा फिल्लौरिया जो फिल्लौरिया गाँव मे लुधिअना के पास पंजाब मे पैदा हुए थे ; अथारासोसत्तर मे या उसके आस पास मे इसकी रचना की थी !

श्री राम-वाल्मीकि संवाद ;Balmiki- Ram Samwad in Ayodhyakand; 5


In Ayodhyakand, Doha 127-131 ; Dialogue between BALMIKI and Shri Ram is very interesting to explain the characteristics of people who want to be nearer to GOD; I will be putting here these Dohas one by one. You will really enjoy reading this:

In Doha 127; Shri Ram ji asked the advice and guidance of Rishi Balmiki as where to live now in our Vanvas awastha? Rishi Balmiki ji, knowing fully well that Shri Ram is reincarnation of Lord Vishnu, said, ” Swami, tell where you are not”;

http://hindi.webdunia.com/religion/religion/hindu/ramcharitmanas/AyodyaKand/21.htm

balmikibalmiki

 

दोहा :
* जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु।
बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु॥131॥
भावार्थ:-जिसको कभी कुछ भी नहीं चाहिए और जिसका आपसे स्वाभाविक प्रेम है, आप उसके मन में निरंतर निवास कीजिए, वह आपका अपना घर है॥131॥
चौपाई :
* एहि बिधि मुनिबर भवन देखाए। बचन सप्रेम राम मन भाए॥
कह मुनि सुनहु भानुकुलनायक। आश्रम कहउँ समय सुखदायक॥1॥
भावार्थ:-इस प्रकार मुनि श्रेष्ठ वाल्मीकिजी ने श्री रामचन्द्रजी को घर दिखाए। उनके प्रेमपूर्ण वचन श्री रामजी के मन को अच्छे लगे। फिर मुनि ने कहा- हे सूर्यकुल के स्वामी! सुनिए, अब मैं इस समय के लिए सुखदायक आश्रम कहता हूँ (निवास स्थान बतलाता हूँ)॥1॥
* चित्रकूट गिरि करहु निवासू। तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू॥
सैलु सुहावन कानन चारू। करि केहरि मृग बिहग बिहारू॥2॥
भावार्थ:-आप चित्रकूट पर्वत पर निवास कीजिए, वहाँ आपके लिए सब प्रकार की सुविधा है। सुहावना पर्वत है और सुंदर वन है। वह हाथी, सिंह, हिरन और पक्षियों का विहार स्थल है॥2॥
* नदी पुनीत पुरान बखानी। अत्रिप्रिया निज तप बल आनी॥
सुरसरि धार नाउँ मंदाकिनि। जो सब पातक पोतक डाकिनि॥3॥
भावार्थ:-वहाँ पवित्र नदी है, जिसकी पुराणों ने प्रशंसा की है और जिसको अत्रि ऋषि की पत्नी अनसुयाजी अपने तपोबल से लाई थीं। वह गंगाजी की धारा है, उसका मंदाकिनी नाम है। वह सब पाप रूपी बालकों को खा डालने के लिए डाकिनी (डायन) रूप है॥3॥
* अत्रि आदि मुनिबर बहु बसहीं। करहिं जोग जप तप तन कसहीं॥
चलहु सफल श्रम सब कर करहू। राम देहु गौरव गिरिबरहू॥4॥
भावार्थ:-अत्रि आदि बहुत से श्रेष्ठ मुनि वहाँ निवास करते हैं, जो योग, जप और तप करते हुए शरीर को कसते हैं। हे रामजी! चलिए, सबके परिश्रम को सफल कीजिए और पर्वत श्रेष्ठ चित्रकूट को भी गौरव दीजिए॥4॥

श्री राम-वाल्मीकि संवाद ;Balmiki- Ram Samwad in Ayodhyakand; 4


In Ayodhyakand, Doha 127-131 ; Dialogue between BALMIKI and Shri Ram is very interesting to explain the characteristics of people who want to be nearer to GOD; I will be putting here these Dohas one by one. You will really enjoy reading this:

In Doha 127; Shri Ram ji asked the advice and guidance of Rishi Balmiki as where to live now in our Vanvas awastha? Rishi Balmiki ji, knowing fully well that Shri Ram is reincarnation of Lord Vishnu, said, ” Swami, tell where you are not”;

http://hindi.webdunia.com/religion/religion/hindu/ramcharitmanas/AyodyaKand/21.htm

Balmiki- Ram Samwad in Ayodhyakand

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दोहा :
* स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात।
मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात॥130॥
भावार्थ:-हे तात! जिनके स्वामी, सखा, पिता, माता और गुरु सब कुछ आप ही हैं, उनके मन रूपी मंदिर में सीता सहित आप दोनों भाई निवास कीजिए॥130॥
चौपाई :
* अवगुन तजि सब के गुन गहहीं। बिप्र धेनु हित संकट सहहीं॥
नीति निपुन जिन्ह कइ जग लीका। घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका॥1॥
भावार्थ:-जो अवगुणों को छोड़कर सबके गुणों को ग्रहण करते हैं, ब्राह्मण और गो के लिए संकट सहते हैं, नीति-निपुणता में जिनकी जगत में मर्यादा है, उनका सुंदर मन आपका घर है॥1॥
* गुन तुम्हार समुझइ निज दोसा। जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा॥
राम भगत प्रिय लागहिं जेही। तेहि उर बसहु सहित बैदेही॥2॥
भावार्थ:-जो गुणों को आपका और दोषों को अपना समझता है, जिसे सब प्रकार से आपका ही भरोसा है और राम भक्त जिसे प्यारे लगते हैं, उसके हृदय में आप सीता सहित निवास कीजिए॥2॥
* जाति पाँति धनु धरमु बड़ाई। प्रिय परिवार सदन सुखदाई॥
सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई। तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई॥3॥
भावार्थ:-जाति, पाँति, धन, धर्म, बड़ाई, प्यारा परिवार और सुख देने वाला घर, सबको छोड़कर जो केवल आपको ही हृदय में धारण किए रहता है, हे रघुनाथजी! आप उसके हृदय में रहिए॥3॥
* सरगु नरकु अपबरगु समाना। जहँ तहँ देख धरें धनु बाना॥
करम बचन मन राउर चेरा। राम करहु तेहि कें उर डेरा॥4॥
भावार्थ:-स्वर्ग, नरक और मोक्ष जिसकी दृष्टि में समान हैं, क्योंकि वह जहाँ-तहाँ (सब जगह) केवल धनुष-बाण धारण किए आपको ही देखता है और जो कर्म से, वचन से और मन से आपका दास है, हे रामजी! आप उसके हृदय में डेरा कीजिए॥4॥

श्री राम-वाल्मीकि संवाद ;Balmiki- Ram Samwad in Ayodhyakand; 3


 

In Ayodhyakand, Doha 127-131 ; Dialogue between BALMIKI and Shri Ram are very interesting to explain the characteristics of people who want to be nearer to GOD; I will be putting here these Dohas one by one. You will really enjoy reading this:

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https://davendrak.wordpress.com/2016/03/17/balmiki-ram-samwad-in-ayodhyakand/

 

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दोहा :
* सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ।
तिन्ह कें मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ॥129॥
भावार्थ:-और ये सब कर्म करके सबका एक मात्र यही फल माँगते हैं कि श्री रामचन्द्रजी के चरणों में हमारी प्रीति हो, उन लोगों के मन रूपी मंदिरों में सीताजी और रघुकुल को आनंदित करने वाले आप दोनों बसिए॥129॥
चौपाई :
* काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा॥
जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया॥1॥
भावार्थ:-जिनके न तो काम, क्रोध, मद, अभिमान और मोह हैं, न लोभ है, न क्षोभ है, न राग है, न द्वेष है और न कपट, दम्भ और माया ही है- हे रघुराज! आप उनके हृदय में निवास कीजिए॥1॥
* सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी॥
कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी॥2॥
भावार्थ:-जो सबके प्रिय और सबका हित करने वाले हैं, जिन्हें दुःख और सुख तथा प्रशंसा (बड़ाई) और गाली (निंदा) समान है, जो विचारकर सत्य और प्रिय वचन बोलते हैं तथा जो जागते-सोते आपकी ही शरण हैं,॥2॥
* तुम्हहि छाड़ि गति दूसरि नाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं॥
जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी॥3॥
भावार्थ:-और आपको छोड़कर जिनके दूसरे कोई गति (आश्रय) नहीं है, हे रामजी! आप उनके मन में बसिए। जो पराई स्त्री को जन्म देने वाली माता के समान जानते हैं और पराया धन जिन्हें विष से भी भारी विष है,॥3॥
* जे हरषहिं पर संपति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी॥
जिन्हहि राम तुम्ह प्रान पिआरे। तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे॥4॥
भावार्थ:-जो दूसरे की सम्पत्ति देखकर हर्षित होते हैं और दूसरे की विपत्ति देखकर विशेष रूप से दुःखी होते हैं और हे रामजी! जिन्हें आप प्राणों के समान प्यारे हैं, उनके मन आपके रहने योग्य शुभ भवन हैं॥4॥

श्री राम-वाल्मीकि संवाद ;Balmiki- Ram Samwad in Ayodhyakand


In Ayodhyakand, Doha 127-131 ; Dialogue between BALMIKI and Shri Ram are very interesting to explain the characteristics of people who want to be nearer to GOD; I will be putting here these Dohas one by one. You will really enjoy reading this:

In Doha 127; Shri Ram ji asked the advice and guidance of Rishi Balmiki as where to live now in our Vanvas awastha? Rishi Balmiki ji, knowing fully well that Shri Ram is reincarnation of Lord Vishnu, said, ” Swami, tell where you are not”; https://davendrak.wordpress.com/2016/03/17/balmiki-ram-samwad-in-ayodhyakand/

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दोहा : 128

* जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु।
मुकताहल गुन गन चुनइ राम बसहु हियँ तासु॥128॥
भावार्थ:-आपके यश रूपी निर्मल मानसरोवर में जिसकी जीभ हंसिनी बनी हुई आपके गुण समूह रूपी मोतियों को चुगती रहती है, हे रामजी! आप उसके हृदय में बसिए॥128॥
चौपाई :
* प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा। सादर जासु लहइ नित नासा॥
तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं। प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं॥1॥
भावार्थ:-जिसकी नासिका प्रभु (आप) के पवित्र और सुगंधित (पुष्पादि) सुंदर प्रसाद को नित्य आदर के साथ ग्रहण करती (सूँघती) है और जो आपको अर्पण करके भोजन करते हैं और आपके प्रसाद रूप ही वस्त्राभूषण धारण करते हैं,॥1॥
* सीस नवहिं सुर गुरु द्विज देखी। प्रीति सहित करि बिनय बिसेषी॥
कर नित करहिं राम पद पूजा। राम भरोस हृदयँ नहिं दूजा॥2॥
भावार्थ:-जिनके मस्तक देवता, गुरु और ब्राह्मणों को देखकर बड़ी नम्रता के साथ प्रेम सहित झुक जाते हैं, जिनके हाथ नित्य श्री रामचन्द्रजी (आप) के चरणों की पूजा करते हैं और जिनके हृदय में श्री रामचन्द्रजी (आप) का ही भरोसा है, दूसरा नहीं,॥2॥
* चरन राम तीरथ चलि जाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं॥
मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा। पूजहिं तुम्हहि सहित परिवारा॥3॥
भावार्थ:-तथा जिनके चरण श्री रामचन्द्रजी (आप) के तीर्थों में चलकर जाते हैं, हे रामजी! आप उनके मन में निवास कीजिए। जो नित्य आपके (राम नाम रूप) मंत्रराज को जपते हैं और परिवार (परिकर) सहित आपकी पूजा करते हैं॥3॥
* तरपन होम करहिं बिधि नाना। बिप्र जेवाँइ देहिं बहु दाना॥
तुम्ह तें अधिक गुरहि जियँ जानी। सकल भायँ सेवहिं सनमानी॥4॥
भावार्थ:-जो अनेक प्रकार से तर्पण और हवन करते हैं तथा ब्राह्मणों को भोजन कराकर बहुत दान देते हैं तथा जो गुरु को हृदय में आपसे भी अधिक (बड़ा) जानकर सर्वभाव से सम्मान करके उनकी सेवा करते हैं,॥4॥

Balmiki- Ram Samwad in Ayodhyakand


In Ayodhyakand, Doha 127-131 ; Dialogue between BALMIKI and Shri Ram are very interesting to explain the characteristics of people who want to be nearer to GOD; I will be putting here these Dohas one by one. You will really enjoy reading this:

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दोहा :
* पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ।
जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ॥127॥
भावार्थ:-आपने मुझसे पूछा कि मैं कहाँ रहूँ? परन्तु मैं यह पूछते सकुचाता हूँ कि जहाँ आप न हों, वह स्थान बता दीजिए। तब मैं आपके रहने के लिए स्थान दिखाऊँ॥127॥
चौपाई :
* सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने। सकुचि राम मन महुँ मुसुकाने॥
बालमीकि हँसि कहहिं बहोरी। बानी मधुर अमिअ रस बोरी॥1॥
भावार्थ:-मुनि के प्रेमरस से सने हुए वचन सुनकर श्री रामचन्द्रजी रहस्य खुल जाने के डर से सकुचाकर मन में मुस्कुराए। वाल्मीकिजी हँसकर फिर अमृत रस में डुबोई हुई मीठी वाणी बोले-॥1॥
* सुनहु राम अब कहउँ निकेता। जहाँ बसहु सिय लखन समेता॥
जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना॥2॥
भावार्थ:-हे रामजी! सुनिए, अब मैं वे स्थान बताता हूँ, जहाँ आप, सीताजी और लक्ष्मणजी समेत निवास कीजिए। जिनके कान समुद्र की भाँति आपकी सुंदर कथा रूपी अनेक सुंदर नदियों से-॥2॥
* भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गुह रूरे॥
लोचन चातक जिन्ह करि राखे। रहहिं दरस जलधर अभिलाषे॥3॥
भावार्थ:-निरंतर भरते रहते हैं, परन्तु कभी पूरे (तृप्त) नहीं होते, उनके हृदय आपके लिए सुंदर घर हैं और जिन्होंने अपने नेत्रों को चातक बना रखा है, जो आपके दर्शन रूपी मेघ के लिए सदा लालायित रहते हैं,॥3॥
* निदरहिं सरित सिंधु सर भारी। रूप बिंदु जल होहिं सुखारी॥
तिन्ह कें हृदय सदन सुखदायक। बसहु बंधु सिय सह रघुनायक॥4॥
भावार्थ:-तथा जो भारी-भारी नदियों, समुद्रों और झीलों का निरादर करते हैं और आपके सौंदर्य (रूपी मेघ) की एक बूँद जल से सुखी हो जाते हैं (अर्थात आपके दिव्य सच्चिदानन्दमय स्वरूप के किसी एक अंग की जरा सी भी झाँकी के सामने स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों जगत के अर्थात पृथ्वी, स्वर्ग और ब्रह्मलोक तक के सौंदर्य का तिरस्कार करते हैं), हे रघुनाथजी! उन लोगों के हृदय रूपी सुखदायी भवनों में आप भाई लक्ष्मणजी और सीताजी सहित निवास कीजिए॥4॥
दोहा :
* जसु

Happiness in Social Context


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Our nature is to be happy. In modern world, Happiness is being connected.
Network, Network, Network…
The number and strength of our social connections are very important for happiness. The quantity and quality of a person’s social connections–friendships, relationships with family members, closeness to neighbors etc.—- is closely related well-being and personal happiness ; the two can practically be equated. People with friendships are less likely to experience sadness, loneliness, low-self-esteem and problems with eating and sleeping.
Increase your SOCIAL Capital and be Happy.

The Nature ( स्वभाव ) is stronger than the training of the individual:2


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Education and training can improve certain traits and skills of an individual but can not change the basic characteristics or nature of an individual. In my previous blog, I have written as  how Marcolphus  demonstrated and proved this point to King Solomon.

Here is another story in this regard. To test Marcolphus , Solomon posted very well trained  ferocious dogs as security guards at the gate of his palace and instructed the security  guards that release these dogs when you see Marcolphus coming to visit me next time. He already warned Marcolphus that be aware of the dogs at the gate and take care as they are very well trained. Marcolphus to prove his point, kept some rabbits with him. As soon as he arrived near the gate, dogs were released to attack at  him but at the same he released those rabbits . Looking at the rabbits, according to their strong nature of hunting , dogs ran after the rabbits  and thus Marcolphus entered the palace without any problem. King Solomon was surprised looking at him. He again proved his point to Solomon.

The Nature ( स्वभाव ) is stronger than the training of the individual


Solomon-the King, SAn individual is what he is, made by his destiny ( or to say a result of his prarabhadh- result of his accumulated kramas; संचित  क्रम .Education and training  may bring slight change but can not alter the individual’s nature. A cat is tempted to catch a rat; a dog is tempted to hold a bone and run after a rabbit.

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Here, I would like to illustrate a story of some dialogues between  SOLOMON the Great and a witty person. Solomon, once said to Marcolphus , the witty man that a person can be changed by providing him education and training . Marcolphus said , yes but to a very limited extent, otherwise, most of the living beings act according to their main characteristics ( सभी  जीव  अपने अपने  स्वाभाव  के अनुसार कार्य  करते हैं  ; उनेह  बदलना  सरल नहीं  है  ) . Solomon asked him to prove his point as he had some very trained animals, they would behave according to their training as would be instructed not otherwise. Solomon invited him for dinner and told that the cat on the table is trained to hold the candle while we are dining and would follow only his instructions. Marcolphus while coming for the dinner, kept three rates in his pocket . He quietly released one rate from his pocket and watched, the cat wanted to move but Solomon instructed his cat not to move; and the cat did not move. Marcolphus released another rate and waited and watched; cat moved more aggressively but stopped again at the instruction of the Master. Marcolphus released the third rat , the cat lost all its patience, dropped the candle and ran after the rate in spite of all the instructions from the Master. Marcolphus very successfully demonstrated and proved his point to Solomon.

http://d.lib.rochester.edu/teams/text/bradbury-solomon-and-marcolf

Regret: My family should have taken care of uncle Om Prakash”OMI”


My uncle, my father,s first cousin , Om Prakash (=OMI) was left alone after the death of his mother. In another blog, I have written about his family’s unfortunate affair that how the family lost all the members of the family , no body to remain at the end.

http://shubhkamna-davendra.blogspot.ca/2015/03/born-only-to-suffer-miseries-miseries.html

Uncle had no resources , income or means to survive as every thing else was sold to survive up to a point. He was in critical condition of survival, loosing health every day.My grandfather was very caring , he took care of the family through out his life though could not improve their situation in any way. Our family should have taken care of the uncle but could not take, perhaps our own financial condition was not very good during this period. He roamed around and did right or wrong , whatever, he could do for his srvival. Finally, he could not fight the circumstances surrounding him and he died young in mysterious circumstances in the District Hospital, Bijnor. No body claimed his dead body, so the Government disposed off his body according its own procedure. Thus came his end and the end of the family and everything of the family. How unfortunate was the end.

I feel sorry and sad about the family and especially the uncle. My family , at least should have taken the responsibility of his last rites of funeral etc. It is regrettable thing for us. Of my own, some time back, I did the sharaddh for him and his mother ( my grandmother). I wish that their souls remain in peace wherever, they are.