शिशु निर्माण में अभिभावकों की महती भूमिका

शिशु निर्माण में अभिभावकों की महती भूमिका
बच्चों में सहज प्रवृत्ति होती है कि उसे प्यार करें और सम्मान दें। प्यार वाली बात तो ठीक पर सम्मान की बात कुछ समझ में नहीं आती है परन्तु ऐसी बात नहीं है, समान की भूख जन्म से ही पाई जाती है। यदि वह उसे उचित मात्रा में और उचित समय पर नहीं मिल पाती है, तो बच्चे के हृदय में हीन ग्रन्थी बनना प्रारम्भ हो जाती है। प्यार और सम्मान के अभाव में बालक इन्हें पाने के लिए ऐसे प्रयत्न करता है, जिससे सभी का ध्यान उसकी ओर बरबस ही आकर्षित हो जाता है। हाँ कोई उपयोगी क्रिया करके आकर्षित करने की स्थिति में तो वह नहीं रहता है, पर वस्तुओं को तोड़- फोड़कर, फेंक- फाँककर और खराब करके सभी को अपनी ओर खींच लेता है। ऐसे क्षणों में वस्तुओं की रक्षा के लिए सभी को उसकी ओर ध्यान देना ही पड़ता है। अस्तु प्यार एवं सम्मान यदि मिलता रहता, तो वह इस प्रकार की दुर्घटना की शरण लेकर अपनी उपेक्षा न करवाता।
बच्चों और बड़ों के बीच बहुत अधिक स्तर का अन्तर होगा, तो उनके बीच खाई बनती चली जावेगी। इसका परिणाम होगा बच्चा लुक- छिपकर अपनी गतिविधि को सम्पन्न करेगा। इस प्रकार के भेदभाव की वृत्ति अभिभावक और बालक के बीच पनपती रहेगी। इसे बढ़ावा न देते हुए बच्चों के सामने अभिभावकों को हर छोटे बड़े कार्य करते रहना चाहिए, जिनका अनुकरण बच्चे घरों में करते रहें। इससे बच्चे यह भी समझने लगेंगे, कि अभिभावक का व्यवहार उनकी समझ के स्तर के अनुसार हो रहा है। बालकों की बहुत सी समस्याएँ तो हल होंगी ही साथ ही बच्चों में अच्छी आदतों का निर्माण भी होगा।
हर अभिभावक यह चाहता है कि उनके बच्चे सभ्य, शिष्ट एवं सुसंस्कारवान बनें। किन्तु बच्चों में इन्हें लाने का प्रयत्न इतना कम होता है, जिससे बच्चे ऐसे नहीं बन पाते हैं। अभिभावकों का अति लाड़ प्यार बच्चों को जैसा वे चाहते हैं, वैसा बनने में रुकावट पैदा करता है। बच्चों की हर बात में लाड़ प्यार के कारण उन्हें बढ़ावा देते रहने से एक दिन वे ही बच्चे उद्दण्ड एवं चोर होते देखे गये हैं। जब लाड़ प्यार का परिणाम यहाँ तक पहुँचता है तब अभिभावक की आँखें खुलती हैं। यदि वे इसके पूर्व ही छान बीन करते हुए अपने बालक को उचित- अनुचित का ज्ञान करवाते रहते तो बच्चे इस सीमा तक नहीं पहुँच पाते।
बच्चों को अपने- पराये का ज्ञान वयस्कों के समान नहीं होता है। इस कारण उसे जो भी वस्तु पसन्द आती है उसे पाने का प्रयत्न करता है। इसे बालक बुद्धि समझकर माता- पिता भी इस पर ध्यान नहीं देते है। इधर बालक निगाह चुराकर हर कहीं से पसन्द की वस्तु को हथियाने लग जाता है। धीरे- धीरे यही उसकी वृत्ति बन जाती है। बच्चे की आवश्यकता को समय पर पूरा कर दिया जाता तो चुराने का साहस कैसे करता? ऐसी माँगों के समय अभिभावक केवल दो ही बातों का ध्यान रखें कि यदि बच्चे की माँग हितकर एवं उपयोगी है तो पैसे न देते हुए उसकी माँगी गई वस्तु ला देना उचित है। यदि माँग बेहूदी और अनुपयोगी है तो अभिभावक ठीक तरह से समझा दें, डाँट- डपट कर उपेक्षा न की जावे। बालकों में शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक आदि अनेक कारणों से अपराध पनप जाया करते हैं। माता- पिता को इस पर पैनी निगाह रखनी चाहिए। यदि ऐसा न किया गया तो बालक मानसिक दुर्बलता के कारण भी अपराध की ओर कदम बढ़ाते है। इस दुर्बलता का कारण या तो बाल्यकाल में उचित शिक्षा का अभाव या दुर्बल बुद्धि का होना होता है। इस कारण वह उचित- अनुचित का निर्णय नहीं कर पाता। ऐसे समय में जब उसे किसी वस्तु को पाने की तीव्र आकाँक्षा जाग्रत होती है और वह सामान्य ढंग से नहीं मिल पावे तो लुक छिप कर प्राप्त करता है। बस यही से चोरी की वृत्ति का पनपना प्रारम्भ हो जाता है। अस्तु बच्चों का मानसिक स्तर भी शारीरिक स्तर के साथ- साथ बढ़ रहा या नहीं, माता- पिता को इसके प्रति सतर्क रहना चाहिए। ऐसा भी होता है कि बालक विविध वस्तुओं का संग्रह करना चाहता है। घर से ही संग्रह करें तब तक तो कोई बात नहीं। पर जब वह दूसरे के घरों से भी संग्रह करने हेतु प्रयत्न करने लगे तो वह चोरी आदि की शरण ले सकता है। क्योंकि संग्रह- वृत्ति उसमें लोभ को बढ़ावा देती है। ऐसे समय में माता पिता मौन निगाह के साथ उसकी संकलन वृत्ति तो बढ़ावें पर संग्रह- वृत्ति नहीं।
बालकों को अनुशासित रखना तो अभिभावक चाहते हैं। लेकिन इनके लिए जो प्रयत्न करते हैं, वे बालोपयोगी नहीं है। वे अनुशासन का उचित शिक्षण तथा अनुशासित व्यवहार प्रस्तुत करने की अपेक्षा तत्काल ही नियंत्रित करने के लिए डाँट- डपट की शरण ले लेते हैं। इससे बच्चा सही बात को नहीं पकड़ता- खीझ का प्रकटीकरण, तोड़- फोड़, चोरी, अन्य अपराध करने में देखा जाता है। एक तरफ तो कड़ा नियंत्रण, तो दूसरी ओर अति लाड़ प्यार के कारण वे उसे बच्चा समझ हर गलती पर छोड़ दिया करते हैं। इससे बच्चा और अधिक अनुशासन हीन होने लगता है। अस्तु कठोर अनुशासन एवं अनुचित प्यार को अभिभावक त्यागते हुए बालक के साथ अनुशासित व्यवहार करें तो बच्चे अनुशासन बद्ध होंगे।
बच्चों की भी अपनी दुनियाँ होती है। उनका भी अपना एक साम्राज्य होता है, जिसमें वे सभी कुछ होते हैं। भावी जीवन की झलक उस दुनियाँ में देखने को मिल सकती है। पर शर्त एक ही है कि अभिभावक इस दुनियाँ में व्यर्थ का हस्तक्षेप नहीं करें। यदि हस्तक्षेप शुरू कर दिया तो उन्हीं क्रियाओं को छिप- छिप कर करेंगे। यह छिपाव बालक को चोरी आदि अपराध की ओर प्रवृत्त करता है। बच्चों के संसार में हस्तक्षेप उतना ही हो, जितना सुधार, निर्देश, सुझाव आदि से सम्बन्धित हो। तो फिर बच्चों को भावी कल का स्वरूप सहज ही दिखाई देगा।
प्रतिस्पर्धाओं के आयोजन भी बच्चों को अपराधी बनाने में सहायता करते हैं। कितने ही बच्चे शक्तिहीन होने के कारण प्रतिस्पर्धा में स्थान प्राप्त नहीं कर सकते है, या परीक्षा में अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण नहीं हो सकते है। ऐसे छात्र वस्तु की तोड़- फोड़ करके या नकल पट्टी करके प्रतियोगिता में आगे निकलने का प्रयत्न करते है। यही परिस्थिति आगे जाकर दुष्प्रवृत्ति का रूप धारण कर लेती है। ऐसे बालकों के लिए साधन, सुझाव, साहस, उत्साह आदि देते रहना चाहिए। ताकि थोड़ी बहुत भी सफलता उन्हें अपने जीवन में दिखाई देगी तो फिर वे इस दुष्प्रवृत्ति की शरण न लेंगे।
बच्चों पर संगति का प्रभाव शीघ्र पड़ता है। बच्चा अनुकरण प्रिय होता है। उसके सामने जो भी गतिविधि आती है उसका अनुकरण करने की चेष्टा करता है। अस्तु बच्चों को कुसंग से दूर रखने के लिए हर संभव प्रयत्न किये जाना चाहिए। यही नहीं, उन्हें अच्छी संगति मिले, ऐसा वातावरण भी उपस्थित किया जाना चाहिए।
बच्चों को भले बुरे का बोध धीरे- धीरे होता रहता है। इस प्रगतिशील समय में यदि माता- पिता सावधानी पूर्वक हर क्षण हर बात पर बच्चे को इसका बोध कराते रहें तो बच्चा अच्छी बातों की ओर प्रवृत्त होने लगेगा, लेकिन यह तभी सम्भव होगा जबकि माता- पिता बुरे काम की बुराई करके उसके बुरे परिणाम तथा अच्छे काम की प्रशंसा कर उसके लाभ समझाते रहें। ऐसा करते रहने से बच्चे में भले- बुरे का बोध होने लगेगा, जो बाद में जाकर विवेक जागृत करने में अधिक सहायक रहेगा।
कुछ अभिभावक भी अपनी ओर से कर्तव्य निभाने का प्रयत्न करें तो बालकों की बहुत सारी समस्याएँ पैदा ही नहीं होगी। हर अभिभावक अपने बच्चों के साथ कुछ समय निश्चित ही व्यतीत करें, जिसमें मानसिक स्तर की सामान्य चर्चा करें, खेल- खेल से वातावरण में सारे निर्देश देते रहें तथा बच्चों की जिज्ञासा यथा सम्भव शान्त करते रहें। इससे उनमें सही और गलत का निर्णय करने की सामर्थ्य पैदा होगी और अच्छाई की ओर बढ़ने का उत्साह बढ़ेगा। यही नहीं, बल्कि अभिभावक बालकों की बहुत सी बारीक समस्याओं को निकट से देख सकेंगे, जिन्हें वे सहज ही बिना कहे समाधित कर लिया करेंगे।
आज कल का युग आर्थिक संकट का है। हर परिवार की आर्थिक क्षमता सीमित है। अस्तु इस बिन्दु को ध्यान में रखते हुए बच्चों में इतनी इच्छाएँ जन्म न ले पावें जो सीमा के बाहर हों। पर उसमें यह भी ध्यान रखना है कि बच्चों की महत्त्वाकाँक्षा दब नहीं जावे। हाँ, उनकी महत्त्वाकाँक्षाओं को ऐसा स्वरूप देते रहना चाहिए जो आर्थिक सीमाओं में पूरी की जा सकें।
अभिभावक कभी- कभी काम को शीघ्र करवाने की दृष्टि से या हठी बालक से काम करवाने के लालच में बच्चों को पैसा देकर काम करवाते हैं। ऐसा माताएँ अधिक किया करती है। इससे बालक में लालच का विकास होगा और फिर वह कोई भी कार्य बिना लालच की पूर्ति किये नहीं करेगा। अस्तु माता- पिता पैसों की आदत तो कभी नहीं डालें। पर पुरस्कार, प्रोत्साहन आदि के सहारे काम भी लिया जा सकता है, जो थोड़ा असामान्य है और अच्छे कामों के लिए प्रेरित भी किया जा सकता है। ऐसा करने से बालकों में आत्मानुशासन जाग्रत होगा, और वे कुंठित, हीन और निराश न होंगे।
यदि माता- पिता हर क्षण बालक के लिए तत्पर रहें तो बाल- समस्या का समाधान एक खेल ही है। किन्तु इसके लिए माता- पिता केवल उपदेश की घुड़की दिलाने की आदत रखेंगे तो समस्या सुलझने की नहीं है, उन्हें भी अपने जीवन में व्यवहारिक बनना होगा। जो उपदेश वे देने जा रहें है उसकी व्यवहारिक झलक उनके दैनिक जीवन में है तो बच्चे को कहने की ही आवश्यकता नहीं, वे अनुकरण से ही उसे जीवन में अपना लेंगे। यह मौन अनुशासनात्मक प्रभाव उपदेशों के नुस्खे की अपेक्षा बाल समस्या का समाधान करने में कारगर रहेगा।
कभी- कभी लड़के लड़कियों में अनावश्यक भय, संकोच और दब्बूपन पाया जाता है। वे अपनी सही बात तक माता- पिता, शिक्षक, समाज के अन्य वयस्कों आदि के सामने नहीं रख पाते हैं। अभिभावक प्रारम्भ से ही ऐसे बच्चों के प्रति सतर्क रहते हुए, उसे भय, संकोच और दब्बूपन से मुक्ति दिलाने का प्रयत्न करें। इसके लिए वे स्वयं व्यक्तिगत एवं व्यवहारिक रुचि लेकर बच्चे को दूसरे के सामने अभिव्यक्त करने हेतु प्रेरित करें। धीरे- धीरे ऐसा करने से उनकी भीरुता दूर हो जावेगी।
कभी- कभी बच्चे भीरु एवं भयभीत माता- पिता के कारण भी हो जाया करते है। उन्हें वे भूत- पलीत की डरावनी कहानियाँ सुनाकर या डर बता कर भयग्रस्त कर दिया करते हैं। बच्चे को बार- बार निरुत्साहित करने से भी भीरु प्रवृत्ति के बन जाते हैं। इसके निवारण के लिए अभिभावक आत्मविश्वास से भरपूर, साहसिक और वीर कहानियाँ बच्चों को सुनाया करें। बच्चों को छोटे- छोटे काम सुपुर्द करके उनमें आत्म- विश्वास की भावना जाग्रत करना चाहिए। ऐसा करते रहने से वे साहसी आत्मविश्वासी एवं कर्मठ बनने लगेंगे।
अधिकाँश बच्चे अपने बाल्य काल में इसलिए निष्क्रिय हो जाया करते है कि उन्हें अपनी रुचि का काम, विषय, वातावरण आदि नहीं मिल पाता है। माता- पिता बच्चे को निष्क्रिय समझ करके उसे निरुत्साहित और निराश किया करते हैं। किन्तु उसकी निष्क्रियता का कारण मालूम करने की चेष्टा नहीं करते हैं। उत्साह और उमंग वहीं होता हैं, जहाँ रुचि का काम मिल पाया हो। अस्तु अभिभावक बालकों की रुचि का पता लगाकर उसके अनुकूल ही उन्हें दिशा देने का काम करें। ऐसा करने से बालकों में उमंग और उत्साह का वर्धन होगा और वे सक्रिय बनने लगेंगे।
कभी- कभी बच्चे अपने दैनिक जीवन में गन्दी आदतों के शिकार हो जाते हैं। दैनिक जीवन की हर क्रिया में अनियमितता रखना और ठीक तरह से काम नहीं करना उनकी आदत सी बन जाती है। इसके लिए माता- पिता बालकों की दिनचर्या पूर्व ही निर्धारित कर दिया करें कि किस समय कौन- कौन सा काम उन्हें करना है। जब उनके सामने स्थिति स्पष्ट हो जावेगी तो बच्चे वैसा करने लगेंगे। बीच- बीच में दिनचर्या के अनुसार कार्य कर रहे हैं या नहीं, इसका निरीक्षण भी करते रहना चाहिए, जिससे बालक दिनचर्या के नाम पर धोखा न देने लगें। इसके लिए सन्तुलित आहार की जितनी व्यवस्था की जानी सम्भव हो, की जानी चाहिए। क्योंकि दुर्बल बच्चे ही अनियमित अधिक हुआ करते हैं।
बालक छोटे- छोटे शिष्टाचार के नाम पर चाहे जैसे सलूक किया करते हैं, जिससे सामाजिक जीवन में उन्हीं बच्चों के कारण नत मस्तक होना पढ़ता है और दूसरी ओर बच्चों को समाज में उचित स्थान नहीं मिल पाता है। अस्तु छींकना, खाँसना, खाना, पानी पीना, कपड़े पहनना, मंजन करना, हँसना, बोलना आदि छोटी- छोटी क्रियाओं में शिष्टाचार का पुट दिया जाना चाहिए। इससे आगे जाकर बच्चे गुणात्मक शिष्टाचार को भली- भाँति पकड़ पावेंगे।
आजकल के बच्चे स्वच्छता और सादगी के प्रति उदासीन रहते हैं। कुछ तो अभिभावक ही स्वच्छता और सादगी से कोसों दूर रहते है फिर बच्चों को क्या कहा जावे। पर माता- पिता को बालक को स्वच्छता, घर सम्बन्धी स्वच्छता एवं सामाजिक स्वच्छता का व्यवहारिक ज्ञान देना चाहिए। इसके लिए अभिभावक स्वयं भी अनुशासित रहें। इससे बच्चे अपने आप अनुकरण करेंगे एवं व्यवहारिक क्रियाओं के द्वारा उनमें स्वच्छता के प्रति रुझान होने लगेगा।
बच्चा भी माता- पिता, स्कूली वातावरण, सामाजिक वातावरण देखकर अपनी खर्चीली माँग प्रस्तुत करता रहता है। किन्तु यदि माता- पिता सादा- जीवन जीने की ओर चेष्टा करें तो बालकों को भी उसके लिए समझ दी जानी सम्भव है। सादा जीवन जीने में वैज्ञानिक लाभ दर्शाते हुए, वैभवपूर्ण जीवन जीने में हानियों का प्रतिपादन किया जावे तो बालकों में सादा- जीवन जीने की आदत आ सकती है।
बालकों की ढेरों समस्याएँ होती हैं, शीघ्र समझना एवं समाधान निकालना बड़ा कठिन है। सामयिक समस्याओं के उठते ही अभिभावक सामयिक समाधान निकालने की सतर्कता रखे रहें। ऐसा करते रहने से घर की बगिया में बच्चे फूल से खिलते दीखेंगे। साथ- साथ समाज और राष्ट्र को भी अच्छे नागरिक बिना प्रयत्न के मिल जावेंगे।

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